उपासना पद्धतियां अलग हो सकती हैं धर्म एक है - रामगोपाल

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सामाजिक सद्भावना बैठक संपन्न
होशियारपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्र समाज और प्रकृति की रक्षा को श्रेष्ठ धर्म मानते हुए कहा है कि हमारी उपासना पद्धतियां व ईश्वर के अस्तित्व को लेकर मान्यताएं अलग हो सकती हैं परंतु धर्म सबका एक है। संघ द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों में सद्भावना पैदा करने के उद्देश्य से आयोजित सामाजिक सद्भावना बैठक को संबोधित करते हुए संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख श्री रामगोपाल ने कहा कि धर्म का अर्थ है कर्तव्य पालन, और राष्ट्र समाज व प्रकृति की रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अपने वेदों का संदेश है ‘धर्म रक्षित रक्षित:’ अर्थात आप अपने धर्म की रक्षा करो और धर्म आपकी रक्षा करेगा।
उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अकेला जीवन व्यतीत नहीं कर सकता, उसकी हर जरूरतें समाज से पूरी होती हैं। अब उस व्यक्ति का धर्म अर्थात कर्तव्य बनता है कि वह समाज की रक्षा करे।
हमारी संस्कृति हर व्यक्ति का धर्म निर्धारित करती है, जैसे राजा का धर्म प्रजापालन, प्रजा का धर्म राजाज्ञा का पालन, पिता का धर्म परिवार का पालन, पुत्र का धर्म पिता की आज्ञा का पालन। अगर सभी वर्ग अपने-अपने धर्म का पालन करें तो उसके अधिकारों की रक्षा स्वत: हो जाती है। अपने सामयिक धर्म का पालन करने के लिए ही गुरु तेगबहादुर जी ने अत्याचारों के खिलाफ अपने जीवन का बलिदान दिया और इससे राष्ट्र की रक्षा हुई। राष्ट्र की रक्षा होने से आज हमारी संस्कृति और हम सुरक्षित हुए।
परिवारिक इकाई को वैश्विक व्यवस्था से जोड़ते हुए श्री रामगोपाल ने कहा कि व्यक्ति के संस्कारित होने से परिवार, परिवार के संस्कारवान होने से समाज, संस्कारिता समाज से राष्ट्र और अंतत: विश्व संस्कारित होगा । संस्कारित विश्व ही मानवता के लिए कल्याणकारी होगा।
मानव इतिहास की विसंगति रही है कि हमने केवल शक्ति व साधन संपन्नता को ही सुख का मार्ग मान लिया और संस्कारों पर ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि संस्कारविहीन शक्ति आतंकवाद बन गई और मानवता विहीन संपन्नता शोषण का माध्यम। इस क्रम को बदलने के लिए हमें पहले खुद को संस्कारवान बनाना होगा। अपने वेद कहते हैं ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम्’ अर्थात् आप श्रेष्ठ बनो और विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
श्री रामगोपाल ने कहा कि वर्तमान में प्रचलित विकास की गलत अवधारणा प्रकृति के विनाश का कारण बन रही है। हमारा धर्म बनता है कि हम प्रकृति की रक्षा करें और विकास व प्रकृति में संतुलन पैदा कर देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाएं।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति अल्पभोग की पैरोकार है और हम प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितनी कि जरूरत हो। हमें प्रकृति का दोहन करना है न कि शोषण। समाज और प्रकृति की रक्षा वर्तमान युग का श्रेष्ठ धर्म है।
इस अवसर पर दिव्य ज्योति जाग्रत संस्थान, ब्रह्मकुमारी आश्रम ,सन्त गरीब दासी सम्प्रदाय , आर्य समाज व् अन्य समाज के गणमान्य प्रमुखों ने भी अपना विचार सभा में रखा ।

Date: 
Saturday, January 7, 2017